Budhape Ka Dard

बुढ़ापे का दर्द

नैतिक कहानियाँ

Budhape Ka Dard: रामादेवी मेरे पास के ही फ्लैट में रहती हैं। कभी-कभी रास्ते में मिल जाती हैं। अक्सर नमस्ते, कैसे हो? बच्चे कैसे हैं? तक ही उनसे मेरी दोस्ती है। उनके घर में उनका इकलौता पुत्र और पुत्रवधू है। उनकी स्वयं की उम्र करीब 65 वर्ष। 2 दिन पूर्व ही मुझे रास्ते में मिली नमस्ते के बाद मैंने अपनी आदतानुसार कहा और बच्चे ठीक हैं? उन्होंने खिन्नता भरे शब्दों में कहा कैसे बच्चे किसके बच्चे? मैं हतप्रभ थी। ऐसे उत्तर की कल्पना नहीं की थी। मैंने पूछा क्या हुआ कैसे परेशान हो? उन्होंने मुझे अपने घर चलने का आग्रह किया मैं टाल नहीं पाई।

उनकी कहानी उनके ही शब्दों में—– मेरे पति की मृत्यु आज से 13 वर्ष पूर्व 55 वर्ष की आयु में ही हो गई थी, सरकारी नौकरी थी उनकी। पढ़ी-लिखी होने के बावजूद मैंने उनकी नौकरी अपने पुत्र को दिलवा दी थी। फंड के करीब 40, 42 लाख मिले।

मैंने पुत्र का विवाह किया साथ ही 30,00000 में यह फ्लैट खरीदा। पुत्र की सैलरी 70,000 है। करीब 6 महीने से उसका व्यवहार काफी बदल गया था, बार-बार कहता था माँ तुम्हे पेंशन के 24,000 मिलते हैं वह हमें क्यों नहीं देती? आप का खर्चा है ही क्या ? रोटी तो हमारे पास खा ही रही हो, कपड़े वगैरा भी हम दिलवा देंगे। मैंने कहा कि मैं पेंशन नहीं दूंगी मेरे भी खर्च है। पीहर जाती हूँ , मंदिर वगैरह में भी जाती हूं, थोड़ा बहुत खर्च करना पड़ता है। और फिर तुझे 70,000 मिलते हैं, मैं तो तुझ से कभी नहीं मांगती। कुछ दिन बाद बेटा धमकी देने लगा “हम चले जाएंगे कहीं और। देखते हैं बुढ़ापे में कौन देखेगा तुम्हे?मैंने भी दिल पर पत्थर रख लिया, होगा जो देखा जाएगा। कल ही सामान लेकर किराए के फ्लैट में चला गया। वहाँ ₹10,000 महीना देना मंजूर है, पर एक मां को रोटी देना भारी पड़ गया। कोई किसी का नहीं है सब स्वार्थी है। मैंने भी बाई (दीदी) लगा ली है। 5000 महीने लेगी,सब काम करेगी, मैं क्यों सुनूं उनकी। साथियों मुझे लग रहा है बुजुर्ग महिला ने सही किया। आपकी क्या राय है?

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